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वीर सावरकर


वीर सावरकर

सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था.

सावरकर ने 1904 में नासिक में ‘मित्रमेला’ नाम से एक संस्था आरंभ की थी जो शीघ्र ही मेजनी के ‘तरुण इटली’ की तर्ज पर एक गुप्त सभा ‘अभिनव भारत’ में परिवर्तित हो गयी.

अभिनव भारत ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए विदेशों से अस्त्र-शस्त्र मंगवाया और बम बनाने का काम रूसियों के सहायता से किया. अनेक गुप्त संस्थाएं बम्बई, पूना, नासिक, नागपुर, कोल्हापुर आदि जगहों में सक्रिय थीं. शीघ्र ही सरकार इनकी कार्यवाहियों से पराजित हो गयी.

सावरकर स्वदेशी आन्दोलन से भी जुड़े रहे.

कालांतर में सावरकर तिलक की स्वराज पार्टी में भी शामिल हुए थे.

उनके राष्ट्रभक्ति से पूर्ण भाषणों एवं गतिविधियों से क्रुद्ध होकर ब्रिटिश सरकार ने उनकी BA की डिग्री वापस ले ली थी.

जून, 1906 को बेरिस्टर बनने के लिए लंदन गये. वहाँ उन्होंने भारतीय छात्रों को भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकत्र किया.

सावरकर ने फ्री इंडिया सोसाइटी नामक एक समूह बनाया जो भारत की स्वतंत्रता के विषय में चर्चा करने के लिए बना था. यह सोसाइटी भारतीय पंचाग के अनुसार विभिन्न पर्वों तथा स्वतंत्रता आन्दोलन से सम्बंधित मुख्य तिथियों को मनाया करती थी.

उन्होंने अंग्रेजो से भारत को मुक्त करने के लिए सशस्त्र आन्दोलन को बढ़ावा दिया और इसके लिए इंग्लैंड में रहने वाले भारतीयों का एक जत्था तैयार किया जिनके पास हथियार भी होते थे.

1908 में उन्होंने 1857 की क्रांति पर एक प्रमाणिक शोधग्रन्थ लिखा. वे अंग्रेजों के इस दावे को नहीं मानते थे कि यह घटना सिपाहियों का विद्रोह थी. इस पुस्तक का नाम ही रखा गया था – 1857 का भारतीय स्वातंत्र्य युद्ध. ब्रिटेन की सरकार ने इस पुस्तक के ब्रिटेन और भारत दोनों जगह छपने पर प्रतिबंध लगा दिया. आगे चलकर इस पुस्तक को मैडम भिकाजी कामा ने हौलेंड में प्रकाशित किया और कालांतर में यह पुस्तक भारत में क्रांतिकारियों तक पहुँच गई.

जन नासिक के कलक्टर ए.एम.टी. जैक्सन को किसी युवा व्यक्ति ने गोली मारी तो सावरकर को इस हत्या का आरोपी इस आधार पर बनाया गया क्योंकि उनका इंडिया हाउस से सम्बन्ध रहा था.

लन्दन में ही सावरकर को मार्च 13, 1910 को बंदी बना दिया गया और भारत भेज दिया गया.

1920 में विट्ठल भाई पटेल, महात्मा गाँधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों ने वीर सावरकर की रिहाई की माँग की परन्तु सावरकर को छोड़ा नहीं गया.

मई 2, 1921 को उनको पहले रत्नागिरी जेल भेजा गया और फिर वहाँ से यरवदा जेल में बंद किया गया. कालांतर में उन्हें कालापानी की सजा मिली और उनको अंडमान निकोबार के सेलुलर जेल में रख दिया गया. वहाँ उन्होंने 14 वर्ष तक यातनाएं सहीं.

रत्नागिरी जेल में रहते हुए सावरकर ने एक और पुस्तक लिखी, जिसका नाम था – हिंदुत्व, हू इज हिन्दू?

सावरकर 1937 से 1943 तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे. जब 22 अक्टूबर, 1939 को कांग्रेस के मंत्रियों ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया तो हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग कर सिंध, बंगाल और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रान्त में सरकारें गठित कीं.

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